सीएमपीडीआईएल से एप्रूवल के बाद भू-अर्जन की तैयारी, धरमजयगढ़ के घने जंगलों के बीच होगा खनन

अब शेरबंद कोल ब्लॉक के लिए मचेगा घमासान
धरमजयगढ़ । धरमजयगढ़ के और कंपनी दस्तक देने वाली है। नीलकंठ कोल माइनिंग प्रालि ने शेरबंद कोल ब्लॉक नीलामी में हासिल किया है। लेमरु एलीफेंट रिजर्व के नजदीक होने के कारण इस कोल ब्लॉक की राह में कई रुकावटें हैं। करीब आधा दर्ज गांवों की 550 हे. भूमि ली जाएगी।
कोल मिनिस्ट्री ने धरमजयगढ़ में शेरबंद कोल ब्लैंक को नीलकंठ माइनिंग प्राप्ति को आवंटित किया है। कमर्शियल महनिंग के लिए आटित इस कोयला खदान की सीमाएं धरमजयगढ़ तहसील के अंतर्गत है। खदान से उत्पादन प्रारंभ कसे की डेडलाइन 2029 में है, लेकिन इसकी जियोलजिकल रिपोर्ट सीएमपी डीआईएल में एप्रूवल के लिए जमा की गई है। शेरबंद कोल ब्लॉक के दायरे में धरमजयगढ़ के करीब आधा दर्जन गांव आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक संरक्षित आदिवासी बिरहोरों को बस्ती भी इनसे प्रभावित हो रही है। इसलिए कोल ब्लॉक के डेवलपमेंट को लेकर संशय पैदा हो गया है। करीब 550 है. भूमि अधिग्रहित करने का अनुमान है, जिसमें 170 हे. वन भूमि है। प्रस्तावित लेमरु एलीफेंट रिजर्व से महज पांच किमी की दूरी पर खनन किया जाएगा। घने जंगल होने के कारण पर्याव्रण को जो नुकसान होगा उसकी भरपाई संभव ही नहीं है। यह क्षेत्र भी हाथियों को आवाजाही के कारण संवेदनशील है। ओपन कास्ट कोयला खनन होने से ज्यादा नुकसान होगा। नीलकंठ मइनिंग कंपनी अब तक खदानों में एमडीओ ले रही थी। अब कर्मार्शयल माइनिंग नेक्टर में उतरी है।

बिरहोर बस्ती तक पहुंचेगा खनन
संरक्षित आदिवासी बिरहोर समुदाय के लिए यह खदान रेड अलर्ट की तरह है। बताया जा रहा है कि इस कोल ब्लॉक के अंतर्गत दर्रीडीह के पास खलबोरा नामक गाव भी आ रहा है। यह गांव बिरहोर बाहुल्य है। कंपनी के सर्वे किया तो ऐसा परिसर भी कोयला धारित क्षेत्र में आया जहां डीएमएफ से पांच करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। बिरहोरों के लिए मिल्क प्रोसेसिंग यूनिट बिल्डिंग, गाय कोठा, बकरी पालन हेड, दुर्गी पालन हेड समेत कई तरह के निर्माण हुप हैं। ग्राम ख़लबोरा में गरीबी मुक्त अवधारणा के तहत पशुधन विकास से संबंधित गतिविधियों के संचालन के लिए पशु चिकित्सा विभाग को 30.59 लाख रुपए दिए गर थे। मिल्क प्रोसेसिंग यूनिट कम ट्रेनिंग सेंटर के लिए भी 12.80 लाख रुपए जनपद पंचायत धरमजयगढ़ को दिए गए थे।



