धरमजयगढ़ में मिलीं 146 दुर्लभ पांडुलिपियाँ, पूर्वजों की धरोहर बचाने में जुटा ज्ञान भारतम मिशन

धरमजयगढ़ :- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में ग्रामीण परिवारों के घरों में संरक्षित सदियों पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियाँ देशभर के पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। चिकित्सा मंजरी, गौ चिकित्सा, तंत्र-मंत्र, चंडी पाठ और लक्ष्मी पुराण जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ आज भी ग्रामीणों द्वारा सुरक्षित रखे गए हैं।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की महत्वाकांक्षी योजना ज्ञान भारतम मिशन के तहत प्रसिद्ध सामाजिक वैज्ञानिक एवं पुरातत्वविद् प्रो. डी.एस. मालिया अपनी टीम के साथ मई-जून 2026 में क्षेत्र का सर्वे कर रहे हैं। सर्वे के दौरान 146 दुर्लभ पांडुलिपियों की पहचान कर उनका डिजिटलीकरण शुरू किया गया है। इससे पहले वर्ष 2003 और 2007 में भी यहां सर्वेक्षण किया गया था।

घट रही है पांडुलिपियों की संख्या
सर्वे के दौरान यह चिंताजनक तथ्य सामने आया कि कई परिवारों में पांडुलिपियों की संख्या लगातार कम हो रही है।जसकेतन परिवार के पास वर्ष 2003 में 3 पांडुलिपियाँ थीं, जबकि वर्तमान में केवल 1 बची है। भोय परिवार के पास 2003 में 16 पांडुलिपियाँ थीं, जो अब घटकर 9 रह गई हैं।
परिजनों के अनुसार परिवार के अन्य सदस्य कुछ ग्रंथ अपने साथ ले गए, जिससे यह अमूल्य विरासत बंटवारे और लापरवाही की भेंट चढ़ रही है।

चार चरणों में होगा संरक्षण
प्रो. मालिया के अनुसार वर्ष 2025 से 2031 तक संचालित ज्ञान भारतम मिशन के तहत पांडुलिपियों का संरक्षण चार चरणों में किया जा रहा है—
1. पहचान एवं डिजिटल मानचित्रण
2. भौतिक सत्यापन
3. कैटलॉगिंग एवं वर्गीकरण
4. संरक्षण एवं डिजिटलीकरण
विशेषज्ञ पांडुलिपियों का रासायनिक उपचार और उच्च गुणवत्ता की स्कैनिंग कर उन्हें डिजिटल रूप में सुरक्षित कर रहे हैं।
लोगों से अपील
प्रो. मालिया ने नागरिकों से अपील की है कि यदि उनके पास ताड़पत्र, ताम्रपत्र या प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित हैं तो वे सरकारी पोर्टल पर उनकी जानकारी साझा करें। इससे मालिकाना हक प्रभावित नहीं होगा, बल्कि संबंधित परिवार और पूर्वजों का नाम राष्ट्रीय अभिलेखों में दर्ज किया जाएगा।
प्रो. मालिया ने कहा कि यह मिशन केवल पुरानी पुस्तकों को संरक्षित करने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक अनुसंधान, नवाचार और ज्ञान-विस्तार के लिए जीवंत संसाधन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।



