1931 के रिकॉर्ड में घास मद, बाद में निजी नामांतरण! 10.67 एकड़ जमीन की 19 बार खरीद-बिक्री पर सवाल


लैलूंगा :- ग्राम राजपुर में शासकीय घास मद की भूमि को निजी संपत्ति बताकर कथित रूप से प्लाट काट-काटकर बेचने का मामला अब तूल पकड़ता नजर आ रहा है। वर्ष 1931-32 के राजस्व रिकॉर्ड में करीब 10.67 एकड़ भूमि घास मद में दर्ज होने की बात सामने आ रही है। वहीं वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख में भी उक्त भूमि चार अलग-अलग टुकड़ों में घास मद के रूप में दर्ज बताए जा रहे हैं।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब भूमि पुराने राजस्व अभिलेखों में घास मद के रूप में दर्ज थी, तो इसके एक हिस्से का निजी व्यक्ति के नाम नामांतरण किस आधार पर किया गया? इसके बाद उसी भूमि की अलग-अलग लोगों के पक्ष में बार-बार बिक्री और नामांतरण कैसे होता रहा?
19 बार हुई खरीद-बिक्री का आरोप
जानकारी के मुताबिक संबंधित भूमि का एक हिस्सा राजपुर निवासी के नाम दर्ज होने के बाद लगभग 19 बार अलग-अलग खरीदारों के पक्ष में खरीदी-बिक्री एवं नामांतरण किए जाने का आरोप है। बताए जा रहे खरीदारों में मानिस बेहरा, अनुजा, चंद्रहास मिश्रा, विनोद नायक, जयप्रकाश, दिगंबर सहित अन्य लोगों के नाम शामिल हैं।
आरोप यह भी है कि PMJSY सड़क से लगी जमीन होने के कारण इसे छोटे-छोटे प्लाटों में विभाजित कर बेचा गया। अब इन जमीनों पर मकान, बाड़ी सहित अन्य निर्माण किए जाने की बात सामने आ रही है।
पुराने रिकॉर्ड बनाम वर्तमान स्थिति पर उठे सवाल
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पुराने राजस्व रिकॉर्ड बताए जा रहे हैं। यदि वर्ष 1931-32 और 1954-55 के अभिलेखों में भूमि घास मद के रूप में दर्ज है, तो बाद के वर्षों में इसके निजी स्वामित्व में आने की प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।
भूमि का नामांतरण किस आदेश के आधार पर हुआ? बिक्री की अनुमति किस आधार पर मिली? क्या संबंधित अधिकारियों ने पुराने रिकॉर्ड में दर्ज भूमि की प्रकृति की जांच की थी? और यदि भूमि शासकीय घास मद की थी, तो उसके बाद हुए लगातार नामांतरण एवं बिक्री की वैधता क्या है—ये सवाल अब जांच का विषय बन गए हैं।
राजस्व मंडल और कलेक्टर से होगी शिकायत
मामले को लेकर संबंधित दस्तावेज जुटाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि बहुत जल्द राजस्व मंडल बिलासपुर तथा जिला कलेक्टर रायगढ़ के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत की जाएगी।
शिकायत में पुराने अधिकार अभिलेख, वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण प्रकरण, बिक्री विलेख तथा भूमि पर किए गए निर्माण की जांच की मांग किए जाने की बात कही जा रही है।
यदि प्रशासनिक जांच में यह साबित होता है कि घास मद की शासकीय भूमि का गलत तरीके से निजी नामांतरण अथवा विक्रय हुआ है, तो मामले में जिम्मेदार लोगों के साथ-साथ संबंधित राजस्व प्रक्रिया की भी जांच की जरूरत पड़ेगी।
फिलहाल मामले में लगाए गए आरोपों की प्रशासनिक पुष्टि नहीं हुई है। राजस्व मंडल एवं जिला प्रशासन की जांच और संबंधित पक्षों के दस्तावेज सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भूमि का स्वामित्व एवं पूर्व में हुए नामांतरण और विक्रय किस आधार पर किए गए थे।



