उड़ती राख, कुचलते नियम: फ्लाईएश के कहर के आगे बेबस प्रशासन?

छाल :- राजधानी के एसी कमरों में जब गाइडलाइनों की फाइलें खुलती हैं, तो व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त नजर आती है। लेकिन जमीनी हकीकत शायद कुछ और ही कहानी बयां कर रही है—जहाँ सड़कों पर उड़ती राख और ओवरलोड ट्रकों का आतंक आम लोगों की सांसों पर भारी पड़ रहा है।
विधानसभा के भीतर खरसिया विधायक उमेश पटेल के तीखे सवालों के जवाब में वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने फ्लाईएश निपटान को लेकर सख्त गाइडलाइनों का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि अब फ्लाईएश के परिवहन और निपटान में नियमों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाएगा।
लेकिन धरातल पर तस्वीर शायद इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले फ्लाईएश से भरे ट्रक खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। ओवरलोडिंग आम बात हो चुकी है और ज्यादातर ट्रकों पर न तो ढंग से त्रिपाल ढका होता है, न ही सुरक्षा मानकों का पालन होता दिखता है।
सड़कों पर दौड़ते ये ट्रक मानो ‘चलती फिरती मौत’ बन गए हैं। इनके पीछे उठने वाली धूल और राख के गुबार से राहगीरों और दोपहिया चालकों का सांस लेना तक मुश्किल हो रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि कुछ सेकंड के लिए सामने कुछ दिखाई देना भी बंद हो जाता है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग—परिवहन और पर्यावरण—मूकदर्शक बने हुए हैं। आरोप हैं कि या तो अधिकारी कार्यवाही से बच रहे हैं या फिर प्रभावशाली ठेकेदारों के दबाव में हैं।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विधानसभा में दी गई गाइडलाइंस केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई हैं? आखिर क्यों ओवरलोडिंग और बिना ढके फ्लाईएश परिवहन करने वालों पर सख्त कार्यवाही नहीं हो रही?
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या फिर उद्योगों की उड़ती राख के नीचे आम आदमी की आवाज सचमुच दब चुकी है—यह सवाल अब और तेज़ी से उठने लगा है।



