बाहर के मुद्दों पर मुखर, अपने क्षेत्र की जनसुनवाई में खामोशी! ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश


छाल की जनसुनवाई में जनप्रतिनिधियों की गैरमौजूदगी पर सवाल
छाल। 29 सितंबर को छाल एसईसीएल खदान का विस्तारीकरण को लेकर जनसुनवाई होना है, परन्तु जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों को लेकर छाल क्षेत्र में आयोजित जनसुनवाई अब सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है। जनसुनवाई में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर ग्रामीणों के बीच सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जिन मुद्दों का सीधा असर उनके क्षेत्र और भविष्य पर पड़ना है, उन पर जनप्रतिनिधियों की अपेक्षित सक्रियता दिखाई नहीं दे रही है।

बाहर विरोध में आवाज बुलंद, अपने क्षेत्र में क्यों खामोशी?
ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जल, जंगल और जमीन से जुड़े मामले पुरुंगा, तमनार और धरमजयगढ़ जैसे क्षेत्रों में सामने आते हैं, तब जनप्रतिनिधि विरोध और आंदोलन के दौरान अपनी मुखर उपस्थिति दर्ज कराते नजर आते हैं। लेकिन जब इसी तरह के महत्वपूर्ण मुद्दे छाल क्षेत्र में सामने आते हैं और जनसुनवाई आयोजित होती है, तब उनकी सक्रिय भूमिका नजर नहीं आने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों से केवल चुनाव के समय संपर्क की अपेक्षा नहीं होती, बल्कि क्षेत्र की जनता से जुड़े संवेदनशील मामलों में उनकी मौजूदगी और आवाज भी महत्वपूर्ण होती है।
जनसुनवाई में जनता की आवाज कौन उठाएगा?
ग्रामीणों के मुताबिक जनसुनवाई प्रभावित लोगों के लिए अपनी बात रखने का महत्वपूर्ण मंच है। यहां ग्रामीण अपनी समस्याएं, आशंकाएं और आपत्तियां सीधे प्रशासन के सामने रखते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि ही ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर सक्रिय भूमिका नहीं निभाएंगे, तो ग्रामीणों की आवाज को मजबूती कौन देगा?
ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र के बाहर होने वाले आंदोलनों में सक्रियता दिखाने वाले जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र की जनसुनवाई में भी उतनी ही गंभीरता के साथ जनता के बीच खड़ा होना चाहिए।
अब जनप्रतिनिधियों के रुख पर नजर
छाल क्षेत्र में जनसुनवाई को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच अब निगाहें स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं। ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि क्षेत्र से जुड़े इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों का वास्तविक रुख क्या है और जनसुनवाई के दौरान वे प्रभावित लोगों के पक्ष को किस स्तर तक प्रशासन के सामने रखेंगे।
फिलहाल जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों के बीच उठ रहे सवालों ने स्थानीय राजनीति और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।



