शासकीय भूमि के निजी हाथों में पहुंचने का आरोप, बोरो के राजस्व रिकॉर्ड पर उठे सवाल


धरमजयगढ़। सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक के बावजूद यदि शासकीय भूमि निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज होकर उसका विक्रय हुआ है, तो यह राजस्व अभिलेखों और पूरी प्रक्रिया की गंभीर जांच का विषय है। धरमजयगढ़ तहसील के पटवारी हल्का नंबर-08, बोरो से जुड़े कुछ दस्तावेज सामने आने के बाद इसी तरह के सवाल उठ रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 1972-73 में वन विभाग से राजस्व विभाग को करीब 5.40 एकड़ भूमि प्रदाय किए जाने का उल्लेख सामने आया है। पुराने राजस्व अभिलेखों में भी संबंधित भूमि के शासकीय स्वरूप में दर्ज होने की बात कही जा रही है।
एक ही खसरा, दो अलग-अलग बिक्री का दावा
मामले में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, योगेश झरिया पिता लालबहादुर झरिया, निवासी जबगा द्वारा लगभग 0.8090 हेक्टेयर भूमि टीवी टावर रोड, अतरमुड़ा, रायगढ़ निवासी एक व्यक्ति के पक्ष में बेचे जाने की जानकारी सामने आई है।
इसी तरह छेदीलाल झरिया पिता कुसबा, निवासी बोरो द्वारा उसी खसरा की लगभग 0.5670 हेक्टेयर भूमि को कोड़केल, तमनार निवासी व्यक्ति के पक्ष में बेचे जाने की जानकारी बताई जा रही है।
ऐसे में मुख्य सवाल यह है कि यदि संबंधित खसरा भूमि के पुराने अभिलेखों में उसका स्वरूप शासकीय दर्ज था, तो बाद में निजी व्यक्तियों के नाम पर स्वामित्व या विक्रय का अधिकार किस आधार पर बना?
1931-32 के रिकॉर्ड में ‘घास मद’, 1972-73 में शासकीय प्रविष्टि
मामले को गंभीर बनाने वाला एक और पहलू पुराने राजस्व अभिलेख बताए जा रहे हैं। मिसल बंदोबस्त 1931-32 में संबंधित खसरा नंबर को ‘घास मद’ में दर्ज होने की बात सामने आई है। वहीं, अधिकार अभिलेख 1972-73 में उक्त खसरे के कुछ हिस्से में ‘शासकीय राजस्व मध्यप्रदेश शासन’ की प्रविष्टि होने का दावा किया जा रहा है।
यदि जांच में इन अभिलेखों की प्रमाणिकता सही पाई जाती है, तो यह महत्वपूर्ण जांच का विषय होगा कि बाद के वर्षों में उक्त भूमि निजी स्वामित्व में किस प्रक्रिया के तहत पहुंची।
रिकॉर्ड में बदलाव हुआ तो किस आधार पर?
मामले में सवाल केवल जमीन की बिक्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड में संभावित बदलाव और उसके आधार को लेकर भी हैं।
- क्या शासकीय भूमि को बाद में निजी भूमि के रूप में दर्ज किया गया?
- क्या नामांतरण अथवा किसी अन्य राजस्व प्रक्रिया के जरिए निजी स्वामित्व तैयार हुआ?
- यदि भूमि शासकीय थी, तो उसके विक्रय के लिए दस्तावेज किस आधार पर तैयार किए गए?
- संबंधित नामांतरण और रजिस्ट्री के समय कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए?
- पूरी प्रक्रिया में संबंधित राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों की क्या भूमिका रही?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार स्तर पर पुराने राजस्व अभिलेखों, नामांतरण आदेशों, रजिस्ट्री दस्तावेजों, खसरा पंचसाला और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड का मिलान कराया जाना जरूरी बताया जा रहा है।
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि शासकीय भूमि को नियमों के विपरीत निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज किया गया अथवा उसका विक्रय हुआ, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल बोरो की इस भूमि से जुड़े पुराने और वर्तमान दस्तावेज कई सवाल खड़े कर रहे हैं। सरकारी से निजी स्वामित्व तक भूमि के कथित हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया किन दस्तावेजों और आदेशों के आधार पर हुई—इसका जवाब अब प्रशासनिक जांच से ही सामने आएगा।



