पुरूंगा में प्रस्तावित अडानी कोल माइंस का विरोध तेज, सोशल मीडिया प्रचार से ग्रामीणों में बढ़ा आक्रोश

धरमजयगढ़। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ विकासखंड अंतर्गत छाल तहसील के पुरूंगा गांव में प्रस्तावित अडानी कोल माइंस को लेकर विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। जल, जंगल और जमीन बचाने की लड़ाई में प्रभावित ग्रामीण एक बार फिर लामबंद नजर आ रहे हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर कंपनी द्वारा क्षेत्र में किए जा रहे विकास कार्यों के दावों ने ग्रामीणों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है।
कड़ाके की ठंड में भी डटे रहे ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि उनका आंदोलन केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। प्रस्तावित खदान के खिलाफ बीते दिनों सैकड़ों ग्रामीणों ने कड़ाके की ठंड में महीनों तक घर-बार और कामकाज छोड़कर खुले मैदान में तंबू लगाकर धरना दिया था। ग्रामीणों के लगातार विरोध और जनदबाव के चलते प्रशासन को प्रस्तावित जनसुनवाई को आगामी आदेश तक स्थगित करना पड़ा था। अब ग्रामीणों का कहना है कि खतरा अभी टला नहीं है और नई रणनीति के जरिए परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
सोशल मीडिया प्रचार पर उठे सवाल
विरोध कर रहे ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कंपनी सोशल मीडिया के माध्यम से सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत किए गए विकास कार्यों का व्यापक प्रचार कर रही है, जबकि जमीनी स्थिति इससे अलग है। ग्रामीणों का दावा है कि पुरूंगा और आसपास के गांवों में सड़क, बिजली, स्कूल और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, जिन सुविधाओं को कंपनी अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रही है, वे वास्तविकता से परे हैं। उनका आरोप है कि यह सब केवल क्षेत्र में प्रस्तावित खदान के लिए माहौल बनाने और आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण को आसान बनाने की कोशिश है।
पर्यावरण और अस्तित्व को लेकर चिंता
ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण और आजीविका को लेकर है। उनका कहना है कि यदि क्षेत्र में कोल माइंस शुरू होती है तो जंगल, जलस्रोत और खेती योग्य भूमि प्रभावित होगी। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि आदिवासी समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली और आजीविका पर भी संकट खड़ा हो जाएगा।
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें किसी कागजी विकास या वादों की नहीं, बल्कि अपनी पुश्तैनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत है।
आंदोलन फिर पकड़ सकता है रफ्तार
प्रस्तावित खदान को लेकर प्रभावित क्षेत्रों में एक बार फिर विरोध की चिंगारियां सुलगने लगी हैं। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि वे अपनी जमीन किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। उनका आरोप है कि सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन को कमजोर करने और लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है।
अब नजर प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की आगामी कार्यवाही पर टिकी है। देखना होगा कि ग्रामीणों की आशंकाओं और मांगों पर किस तरह ध्यान दिया जाता है तथा प्रस्तावित परियोजना को लेकर आगे क्या निर्णय सामने आता है।



