खेती का सीजन सिर पर, डीजल के इंतजार में किसानों की लंबी कतारें

महंगे कृषि उपकरण बने शोपीस, ईंधन संकट से ठप होती खेती
छाल:- देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों को आधुनिक और विकसित खेती की ओर बढ़ाने के लिए सरकारें लगातार बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। अत्याधुनिक कृषि उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा देने और किसानों को कम कीमत पर मशीनें उपलब्ध कराने की योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। लेकिन छाल क्षेत्र में जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। यहां आधुनिक खेती के लिए खरीदे गए कृषि उपकरण अब किसानों के लिए परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं।

दावे बड़े, हकीकत में डीजल गायब
इन दिनों छाल क्षेत्र के पेट्रोल पंपों पर सुबह से देर रात तक किसानों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। खेतों में मेहनत करने वाला अन्नदाता अब ट्रैक्टर लेकर डीजल के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहने को मजबूर है। भीषण गर्मी में किसान अपना खेती-किसानी का काम छोड़कर ईंधन के इंतजार में समय बर्बाद कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि क्षेत्र में डीजल-पेट्रोल की कोई कमी नहीं है और सप्लाई पूरी तरह सामान्य है। लेकिन यदि स्थिति सामान्य है, तो आखिर किसान पंपों पर दिनभर कतारों में क्यों खड़े हैं? यह सवाल अब किसानों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है।

महंगे कृषि उपकरण बने शोपीस
खेती के आधुनिकरण के नाम पर किसानों ने भारी रकम खर्च कर ट्रैक्टर और अन्य कृषि मशीनरी खरीदी है। कई किसानों ने इसके लिए कर्ज तक लिया, ताकि कम समय में बेहतर खेती कर सकें। लेकिन अब हालात यह हैं कि इन मशीनों को चलाने के लिए जरूरी ईंधन ही उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
किसानों का कहना है कि खेती का सीजन सिर पर है। जुताई और बुआई का समय निकलता जा रहा है, लेकिन वे खेतों में काम करने के बजाय डीजल की तलाश में भटक रहे हैं। यदि समय पर ईंधन नहीं मिला, तो खेती का पूरा चक्र प्रभावित हो सकता है।
खेती पर पड़ रहा सीधा असर
ग्रामीण क्षेत्रों में डीजल-पेट्रोल की अनियमित सप्लाई का सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है। आधुनिक खेती के बड़े-बड़े दावे जमीनी स्तर पर ईंधन संकट के आगे दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। किसानों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो इसका खामियाजा पूरे कृषि उत्पादन को भुगतना पड़ेगा।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन किसानों की इस गंभीर समस्या पर कितनी तेजी से कदम उठाता है, या फिर अन्नदाता यूं ही पंपों की कतारों में खड़े होकर अपनी किस्मत को कोसता रहेगा।



