जांच आते ही गायब हुए ओवरलोड फ्लाईऐश ट्रक, प्रशासन पर उठे सवाल..

छाल :- क्या ओवरलोड वाहन अब सड़कों पर नहीं बल्कि जादुई तरीके से अदृश्य होकर चल रहे हैं यह सवाल आजकल क्षेत्र की जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। टी आर एन से लेकर भारतमाला प्रोजेक्ट तक दिन रात फर्राटे भर रहे ओवरलोड फ्लाईऐश वाहनों की हकीकत और विभागीय जांच के दावों के बीच का अंतर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

जांच दल के आते ही साफ हो गई सड़कें:- पिछले दिनों जब फ्लाईऐश के ओवरलोड वाहनों की लगातार शिकायतों के बाद जिला प्रशासन की टीम धरातल पर जांच करने पहुंची तो नजारा बेहद अजीबो गरीब था। जिन सड़कों पर आम जनता धूल और गिरते हुए फ्लाईऐश से त्रस्त है वहां जांच टीम को एक भी फ्लाईऐश वाहन नजर नहीं आया।

क्या प्रशासन के पहुंचने से पहले ही ओवरलोड वाहनों के बेड़े को ग्रीन सिग्नल या सूचना मिल गई थी या फिर ये वाहन केवल तभी गायब हो जाते हैं जब खाकी या प्रशासनिक गाड़ी सड़क पर उतरती है।
कार्यवाही के नाम पर केवल खानापूर्ति:- हैरानी की बात यह है कि टीम को फ्लाईऐश की गाड़ियां तो नहीं मिलीं लेकिन कार्यवाही का कोटा पूरा करने के लिए बिना तिरपाल वाली अन्य छोटी मोटी गाड़ियों पर चालान काटकर इतिश्री कर ली गई। जमीनी हकीकत यह है कि सैकड़ों वाहन क्षमता से अधिक राखड़ लादकर सड़कों पर काल बनकर दौड़ रहे हैं।क्षेत्र की जनता का कहना है कि
सड़कों पर फ्लाईऐश गिरते रहने से दोपहिया वाहन चालकों और राहगीरों की आंखों और सांसों पर बन आ रही है।सड़क पर राखड़ गिरने का मुख्य कारण वाहनों में क्षमता से कहीं ज्यादा राखड़ भरा जा रहा है।जिस कारण सड़को की दुर्दशा भी भारी वाहनों के दबाव से करोड़ों की लागत से बन रही सड़कें समय से पहले दम तोड़ रही हैं।

प्रशासनिक तंत्र पर उठते गंभीर सवाल:- क्षेत्र की जनता अब खुलेआम पूछ रही है कि आखिर जिला टीम को ये हाथी जैसे ट्रक दिखाई क्यों नहीं दिए क्या यह केवल सिस्टम की सुस्ती है या फिर परिवहन माफिया और जिम्मेदार अधिकारियों के बीच का कोई मौन समझौता सड़क पर उड़ती राख और लोगों की आंखों में पड़ता फ्लाईऐश इस बात का गवाह है कि सिस्टम भले ही आंखें मूंद ले लेकिन सच्चाई छिपने वाली नहीं है।
अब देखना यह होगा कि क्या भविष्य में प्रशासन कोई ठोस कार्यवाही करता है या फिर मिस्टर इंडिया बने इन वाहनों का खेल यूं ही चलता रहेगा।



